ड्रम में मिले ₹3-करोड़ के असली मालिक का पता नहीं:पत्नी का दावा- टैक्सी-रिक्शा चलाकर कमाया, सब ले गए; अब सता रहे

28 अक्टूबर, 2026 की रात करीब 8 बजे। प्रयागराज का एक गांव…। चारों तरफ सन्नाटा पसरा था। पुलिस ने गांव की लाइट कटवा दी थी। मौका देखकर 25-30 पुलिसवाले धड़धड़ाते हुए एक घर में दाखिल हुए। घरवाले खा-पीकर सोने की तैयारी में थे। अचानक इतनी फोर्स देखकर घर की औरतों और बच्चों के हाथ-पैर फूल गए। लेकिन, मर्दों को कुछ अंदाजा हो चुका था। कुछ बातचीत के बाद पुलिसवालों ने घर के आंगन में खुदाई शुरू कर दी। अब तक घर के बाहर मजमा-सा लग गया था। इस तरह की कार्रवाई से गांववाले भी सकते में थे। चर्चा हो रही थी कि हफ्ते भर पहले दुर्गा पूजा पर जो विवाद हुआ था, खूब बवाल हुआ था, घर के लोग दरोगा से भी भिड़ गए थे। उसी चक्कर में पुलिस आई है। लेकिन, जब असली बात पता चली तो सबके होश उड़ गए। घर के आंगन में जमीन के नीचे से नोटों से भरे 3 ड्रम मिले थे। पांच-पांच सौ रुपए की 640 गड्डियां थीं। किसी ने सोचा भी नहीं था कि गांव के एक घर में जमीन के नीचे ‘खजाना’ दबा हुआ है। इस पूरे वाकये को 10 दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक यह नहीं पता चला कि आखिर ये रुपया आया कहां से…? गांववालों के बीच इसे लेकर तीन तरह की चर्चाएं हैं- पहली- घर के मर्द पुणे की जिस कंपनी में काम करते थे, वहां छापा पड़ा। ये लोग पैसा लेकर गांव आ गए और दोबारा वापस ही नहीं गए। दूसरी- पुणे में रहते हुए किसी सोनार के यहां पैसा चोरी करके भाग आए। ब्लैक मनी की वजह से सोनार ने भी पुलिस में शिकायत नहीं की। तीसरी- परिवार की महिलाओं का दावा है कि उन्होंने दिन-रात काम करके रुपये कमाए और बचाए हैं। ये रुपए कहां से आए, इसे समझने के लिए दैनिक भास्कर की टीम उस गांव में पहुंची। आइए, जानते हैं क्या पता चला… प्रयागराज जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर ‘बरईपुर रामनगर’ गांव है। वहां पहुंचकर हमने इस बारे में गांववालों से बात करने की कोशिश की। लेकिन, लोग कुछ भी बोलने से बचते रहे। कहने लगे, उनके खिलाफ बोलेंगे तो विवाद हो जाएगा। वो लोग लड़ाई-झगड़ा करने लगते हैं। काफी समझाने और नाम न छापने की शर्त पर गांववाले भाइयों के अमीर होने की कहानी सुनाते हैं। राजेश (जिनके घर रुपए मिले) बहुत छोटी उम्र में कमाने के लिए पुणे (महाराष्ट्र) चला गया था। परिवार में कुल 10 भाई-बहन हैं, जिनमें 6 भाई और 4 बहनें हैं। सभी बहनों और दो भाइयों यानी सबसे बड़े राजेश और दूसरे नंबर के सतीश की शादी हो चुकी है। बाकी चार राकेश, लवकुश, रजनीश, छोटू अभी कुंवारे हैं। पिता किसान, ये लोग पढ़ नहीं सके, कम उम्र में कमाने लगे इन लोगों के पिता जब तक जीवित थे, खेती-किसानी और मजदूरी करके परिवार पालते थे। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि बच्चों को पढ़ा सकें, इसलिए घर के लड़के छोटी उम्र में ही खाने-कमाने की जुगाड़ में लग गए। 2001 में राजेश 13 साल का था, उस वक्त वो मुंबई चला गया था। वहीं छोटा-मोटा काम करता रहा। कुछ वक्त के बाद पुणे चला गया। रहने-खाने के बाद जो भी बचता, उसे घर भेज देता। छोटे भाई सतीश को भी पुणे बुला लिया। दोनों ‘मार्शल ट्रेडिंग कंपनी’ में काम करने लगे। राजेश ने अपने दो और भाइयों राकेश उर्फ महाकाल और रजनीश की नौकरी भी उसी कंपनी में लगवा दी। 2013 में राजेश की शादी हो गई। सभी एक साथ पुणे में ही रहते थे। 2018-19 में राजेश ने नौकरी छोड़ दी और पुणे के ‘रास्ता पेठ’ इलाके में ‘राज फुटवेयर’ नाम से जूते-चप्पल की दुकान खोल ली। 2022 में सभी गांव लौटे और करोड़ों की प्रॉपर्टी बनाई गांववाले बताते हैं कि साल 2022 में सभी भाई अचानक गांव वापस आ गए। साथ में बहुत सा पैसा लेकर आए, भाइयों ने सबसे पहले 8 कमरों का घर बनवाया। गांव के बाहर मेंडारा चौराहा है, यहीं मेन रोड पर 25 लाख रुपए में करीब 4 बिस्वा जमीन खरीदी।
करीब 50 लाख रुपए खर्च करके ‘दो मंजिल का शॉप कॉम्प्लेक्स’ बनवाया। पहले फ्लोर पर 6 दुकानें बनवाई, नीचे के पूरे हिस्से में राजेश और राकेश ने सीमेंट-बालू की दुकान खोली। एक भाई को डीजे-साउंड का बिजनेस करवाया। इसके अलावा बेहद उपजाऊ कछार एरिया में करीब 22 बीघा खेत खरीदा। गांव में मंदिर बनवाने के लिए भी रुपए दिए। गांव वाले इतना समझ चुके थे कि इन भाइयों के पास ठीक-ठीक रुपए हैं। राजेश और उसके परिवार के बारे में पता करने के बाद दैनिक भास्कर की टीम उनके घर पहुंची। यह जानकर कि मीडियावाले आए हैं, राजेश और राकेश घर से भाग गए। घर की महिलाएं बात करने से बचती रहीं, काफी मान-मनौवल के बाद वे बातचीत को तैयार हुईं। राजेश की पत्नी बोली- टैक्सी-रिक्शा चलाकर घर बनवाया, बिजनेस किया हमारी मुलाकात राजेश यादव की पत्नी पुष्पा से हुई। वे कहती हैं- हमारे पति जब छोटे थे, तभी कमाने चले गए। मुंबई में रात-दिन रिक्शा-टैक्सी चलाया। अपनी कमाई से 4 बहनों की शादी की। किसी से कर्ज नहीं लिया। उन्होंने ही घर बनवाया, फिर भाई की शादी की। पुणे से लौटकर यहां बिजनेस शुरू किया। हम लोगों का गांव में किसी से कोई झगड़ा नहीं है। सभी अपने काम-धंधे में बिजी रहते हैं। हमने पूछा कि आपके घर इतना पैसा कहां से आया? इस पर पुष्पा कहती हैं- पैसा कहां से आया हमें कुछ नहीं पता। अब हम बस यही कहते हैं कि हम लोगों को आराम से रहने दिया जाए। आखिर हम लोग कहां तक भागेंगे? बच्चे पढ़ाई नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे ही परेशान किया जाता रहा तो जान देने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं बचेगा। दूसरे नंबर के भाई सतीश की पत्नी पूजा भी पुष्पा की बात दोहराती हैं। वे कहती हैं- हमारे घर के लड़के इधर-उधर भाग रहे हैं। हम सरकार से कहना चाहते हैं कि उन्हें घर पर रहने दिया जाए। कोई किसी के घर कितना दिन रहेगा। वो लोग जहां हैं, वहां से भी कहा जा रहा कि अपने घर जाइए। अब जो फैसला होगा, सरकार करेगी। फुफेरा भाई बोला- पैसा लेकर आए, लेकिन इस्तेमाल नहीं पाए घर पर ही हमारी मुलाकात राजेश-राकेश के फुफेरे भाई करन यादव से हुई। करन कहता है- ये लोग पुणे की जिस कंपनी में काम करते थे, वहां मैंने भी 4 साल काम किया है। वहां लोहा काटने का काम होता था। ये लोग हमसे 5 साल पहले से ही काम कर रहे थे। हमारी नौकरी 18 हजार रुपए में लगवाई थी। ये लोग पहले से थे तो इनकी 28-30 हजार रुपए सैलरी थी। डे-नाइट शिफ्ट से अच्छा पैसा बना लेते थे। करन बताता है कि कुछ दिन पहले दुर्गा पूजा के वक्त कुछ गांववालों से विवाद हो गया था। उसी में गांव के या फिर परिवार के ही किसी आदमी ने शिकायत कर दी और रेड डलवा दी। ये पैसा कहां से आया, हमें नहीं पता। लेकिन आदमी पैसा लेकर आया और उसे इस्तेमाल भी नहीं कर पाया। जबकि, सही तरीके से कमाकर पैसा लाया। अपने घर में रखा था, अब सब चला गया। ऊपर से सताया जा रहा है, ऐसा नहीं होना चाहिए। दुर्गा विसर्जन पर पुलिस से विवाद, वही वजह बना करन ने जिस विवाद की बात की, उस बारे में जानने के लिए हम गांव के दूसरे हिस्से में पहुंचे। लोग बताते हैं कि दुर्गाजी की मूर्ति विसर्जन यात्रा निकल रही थी। उसमें इन्हीं लोगों का डीजे लगा था। डीजे को लेकर ही गांव के किसी व्यक्ति से कुछ कहासुनी हुई। विवाद बढ़ा तो राकेश और उसके भाइयों ने मारपीट शुरू कर दी। पुलिस आई तो ये लोग उनसे भी उलझ गए। पहले डायल 112 के 2-3 सिपाही आए, फिर श्रृंगवेरपुर चौकी से दरोगा और सिपाही आए। राकेश दरोगा से भी भिड़ गया। मामला संभालने के लिए नवाबगंज थाने से बड़े दरोगा और काफी फोर्स आई, तब जाकर मामला कंट्रोल हुआ। पुलिस ने इस घटना को गंभीरता से लिया और परिवार की पृष्ठभूमि की जांच शुरू कर दी। गांववाले बताते हैं- इसी दौरान पुलिस को इनपुट मिला कि इन्हें कहीं से बहुत सारा सोना-चांदी मिला है। उसी के दम पर लगातार संपत्ति बना रहे हैं। इसी इनपुट पर पुलिस ने 28 अक्टूबर की रात छापेमारी की। सोना-चांदी तो नहीं मिला लेकिन जमीन के नीचे नोटों से भरे 3 ड्रम मिले। आयकर विभाग भी इसमें शामिल हुआ। गिनती हुई तो पता चला कि कुल 3 करोड़ 20 लाख 93 हजार रुपए हैं। पुणे की पुलिस टीम जल्द आएगी प्रयागराज गांववाले कहते हैं कि इन लोगों ने पैसा खर्च करने में बहुत समझदारी दिखाई थी। जमीन भी कछार एरिया में खरीदी। घर में पैसा रखा ही था, इसलिए गर्मी चढ़ गई थी। इसी वजह से गांववालों से झगड़ने लगे। इनके भाई और बहनोई सब पुणे में ही रहते थे। अचानक वहां से पैसा लेकर चले आए, उन लोगों को तो पता ही रहा होगा। अब उन्हीं में से किसी ने मामला खोल दिया। फिलहाल घटना को 10 दिन बीत चुके हैं। सारा पैसा आयकर विभाग ने बैंक में जमा करवा दिया है। लेकिन, इस बात का अब तक पता नहीं चल सका कि ये पैसा कहां से आया है। पुणे की ‘मार्शल ट्रेडिंग कंपनी’ का नाम सामने आने के बाद पुणे पुलिस कमिश्नर के पास रिपोर्ट भेजी गई है। जल्द ही पुणे पुलिस की टीम प्रयागराज आकर मामले की जांच करेगी। ————————— ये भी पढ़ें… ‘साफ-सुथरा रहने की बीमारी’ ने स्टूडेंट की जान ली:नोट में लिखा- बुरा होने का डर रहता है; एक काम बार-बार क्यों करते हैं लोग आपने अक्सर सुना होगा कि फलां व्यक्ति को ‘सफाई करने की बीमारी’ है या फलां व्यक्ति एक ही काम को दोहराता रहता है…। दो दिन पहले इसी बीमारी की वजह से प्रयागराज की रितु शर्मा ने सुसाइड कर लिया। डेथ नोट में लिखा- मैं एक ही चीज को बार-बार दोहराती हूं। ऐसा नहीं करने पर दिमाग मुझे डराता है कि कुछ बुरा हो जाएगा। अब मैं थक चुकी हूं। आखिर क्या है ये ‘सफाई की बीमारी’ जिसने एक होनहार छात्रा को सुसाइड करने पर मजबूर कर दिया? पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में…