इंदिरा का चुनाव रद्द कराने वाले राजनारायण:स्पीकर ने टोका तो हंसते हुए कहा-साहब! ये सिगरेट नहीं, मेरे विचारों का धुआं है

25 जून, 1975… यह वो दिन है, जिसे काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लागू कर दी थी। उस दौर के बड़े-बड़े नेताओं को सलाखों के पीछे डाल दिया गया था। उन्हीं में से एक थे राज नारायण। उन्होंने इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में देश की उस समय की सबसे ताकतवर नेता और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को रायबरेली सीट से चुनाव हरा दिया था। कौन थे राजनारायण? उनके गांव की अब स्थिति क्या है? उनके परिवार में कौन-कौन है? यह सब जानने के लिए दैनिक भास्कर राजनारायण के वाराणसी स्थित गांव मोतीकोट पहुंचा। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… मोतीकोट एक समृद्ध और पुराना गांव है। यह बनारस के शाही नारायण परिवार और बनारस रियासत के इतिहास से जुड़ा है। राजनारायण का जन्म 23 नवंबर, 1917 को एक धनी भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता अनंत प्रताप सिंह थे। परिवार का संबंध बनारस के पूर्व शासकों महाराजा चेत सिंह और बलवंत सिंह की वंश परंपरा से था। यह गांव उस समय धन और मान-सम्मान के लिए जाना जाता था। अनंत प्रताप सिंह के 3 बेटे थे। अंबिका सिंह, राजनारायण और बद्री नारायण। इन तीनों के 3-3 बेटे थे। राजनारायण के जो 3 बेटे थे, उनमें एक कल्लीपुर (वाराणसी), दूसरा लहुराबीर और तीसरा बेटा प्रयागराज में रहता था। 2 बेटों का निधन हो चुका है। राधे मोहन सिंह का निधन 20 जून, 2025 को हुआ। सबसे छोटे बेटे ओम प्रकाश सिंह मीरजापुर में रहते हैं। भाई की डेथ के बाद प्रयागराज गए थे। जहां पुराना घर गिरा, अब कॉलेज की बिल्डिंग
अंबिका सिंह के बेटे सुभाष सिंह (76) बताते हैं- राजनारायण का जन्म यहीं हुआ था। पुराना घर गिरा, तो अब यहां कॉलेज की बिल्डिंग खड़ी हो गई। उन्होंने पहली बार अपने वोट का इस्तेमाल साल-1962 में किया था। सुभाष सिंह चाचा राजनारायण के बारे में कहते हैं कि उनका आंदोलनों के चलते अधिकतर समय बाहर ही बीता। वाराणसी के लहुराबीर में भी रहकर वह लोगों के लिए काम करते थे। गांव से उनका लगाव कम था। वह गांव तभी आते थे, जब उनके पास पैसे खत्म हो जाते थे। सुभाष सिंह को शिकायत है कि राजनीतिक दलों ने उनको वो स्थान नहीं दिया, जो उन्हें मिलना चाहिए था। बाहुबली से लेकर दिग्गजों ने बनाया दबाव
सुभाष सिंह बताते हैं- 1971 में जब राजनारायण चुनाव हार गए, तो इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव में धांधली काे लेकर याचिका दाखिल कर दी। तब रायबरेली के बाहुबलियों से लेकर तमाम दिग्गज याचिका वापस कराने पर लग गए, लेकिन राजनारायण नहीं माने। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने फैसला सुनाते हुए 1975 में चुनाव को रद्द कर दिया। इंदिरा गांधी ने लगाई इमरजेंसी
कोर्ट के इस फैसले के बाद इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा दी। इसके बाद भारतीय इतिहास का जो दौर शुरू हुआ, उसे काला अध्याय माना जाता है। बहरहाल, इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1977 में हुए चुनावों में राजनारायण ने रायबरेली लोकसभा सीट से इंदिरा गांधी को भी हरा दिया। इस चुनाव में कांग्रेस के कई दिग्गज उम्मीदवारों को भी हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद जनता पार्टी की सरकार बनी और राजनारायण देश के स्वास्थ्य मंत्री बने। चुनाव प्रचार करने से रोकते थे
सुभाष सिंह बताते हैं- 1977 में जब राजनारायण रायबरेली से चुनाव लड़ रहे थे, उस समय स्थानीय बड़े नेताओं ने उनके समर्थकों को प्रचार से रोका। मुख्य मार्गों पर चेकिंग के बाद ही लोगों को रायबरेली में प्रवेश दिया जाता था। इसके बाद भी समर्थक प्रचार के लिए गांवों में पगडंडियों का सहारा लेकर लोगों तक पहुंचते थे। नौकरी से निकालने के लिए दी धरने की धमकी
सुभाष सिंह बताते हैं- राजनारायण के परिवार से होने की वजह से मेरी उड़ीसा में एक इंडस्ट्री में नौकरी लग गई थी। जब यह बात चाचा को पता चली, तो वे सीधे तत्कालीन मुख्यमंत्री बीजू पटनायक के पास पहुंचे। मुझे नौकरी से निकालने की मांग कर दी। राजनारायण का कहना था कि मेरे परिवार के लोग अगर मेरी वजह से लाभ लेने लगेंगे, तो मेरे आंदोलन का मकसद खत्म हो जाएगा। उन्होंने यहां बीजू पटनायक से कह दिया था कि अगर सुभाष को नहीं निकाला, तो धरने पर बैठ जाऊंगा। जब बकाएदारों को लेकर पहुंच गए कमलापति के घर
वरिष्ठ पत्रकार और वाराणसी में जमीनी स्तर की जानकारी रखने वाले मोहम्मद इसहाक बताते हैं- 1980 के चुनाव में वाराणसी में राजनारायण और कमलापति त्रिपाठी का मुकाबला था। राजनारायण चुनाव हार गए। इसके बाद इनके घर पर माइक, टेंट, कुर्सी लगाने वालों की भीड़ लग गई। सब अपने-अपने बकाए की मांग करने लगे। उन्होंने कहा कि सभी लोग अपना-अपना बिल दोगुना बनाकर लाओ। इसके बाद वे सभी को लेकर कमलापति त्रिपाठी के घर पहुंच गए। कमलापति बाहर आ गए। राजनारायण ने कहा कि ये हमारे कार्यकर्ता नहीं, बकाएदार हैं। हम चुनाव हार गए हैं और आप जीते हैं, इनका खर्चा आप दीजिए। कमलापति त्रिपाठी ने अपने मुंशी को बुलाया और सभी का भुगतान कराया। बहादुरी और साहस के चलते-फिरते स्कूल थे राजनारायण
वाराणसी में उनके पुराने साथी और समाजवादी नेता शतरुद्र प्रकाश (80) बताते हैं- राजनारायण ने मेरी शादी कराई। उसका जिम्मा खुद उठाया। चौधरी चरण सिंह उस शादी में आए और उन्होंने कन्यादान किया। शतरुद्र बताते हैं कि 1947 के बाद से आज तक किसी प्रधानमंत्री को जनता की अदालत और कानून की अदालत में किसी ने अगर हराया है, तो वह राजनारायण हैं। शतरुद्र प्रकाश बताते हैं कि वे परिवारवादी नहीं थे। वे जब विधायक थे, लखनऊ में 98 बी (दारुल शफा) में उनके आवास पर बैठक थी। लोहिया मौजूद थे। तभी एक फोन आया, उन्होंने फोन सुना और रख दिया। लोहिया ने पूछा तो उस समय वे कुछ नहीं बोले। बाद में बताया कि उनके बेटे की मौत हो गई है। उसी के लिए फोन था। बैठक चल रही थी, इसलिए नहीं बताया। शतरुद्र प्रकाश बताते हैं कि एक बार जब एएमयू का माइनॉरिटी कैरेक्टर इंदिरा गांधी बदलना चाहती थीं। राजनारायण ने इसका विरोध किया। उस समय हम लोगों की गिरफ्तारी हुई, वाराणसी जेल में रहे। भतीजे का टिकट कटवाकर मुझे दिलवाया
शतरुद्र बताते हैं कि 1974 में विधानसभा का चुनाव था। उस समय राजनारायण के भतीजे अनिल सिंह को चौधरी चरण सिंह ने टिकट दे दिया। इस पर राजनारायण नाराज हो गए। वे चौधरी चरण सिंह के पास शतरुद्र को लेकर पहुंचे और टिकट बदलवा दिया। राजनारायण का राजनीतिक जीवन सुभाष सिंह के बेटे अभिषेक सिंह कहते हैं कि उस दौर के जो भी नेता थे, वे या तो जनसंघ से जुड़े थे या फिर कांग्रेस की देन थे। जबकि, राजनारायण समाजवादी आंदोलन से निकले नेता थे। वे डॉ. राम मनोहर लोहिया को अपना अनुयायी मानते थे। वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और बाद में जनता पार्टी के प्रमुख नेता रहे। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद वे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने। राजनारायण के मशहूर किस्से… जेल नहीं लोकतंत्र का ट्रेनिंग कैंप : राजनारायण स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आपातकाल तक कई बार जेल गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी थी। आपातकाल 1975-77 के दौरान भी उन्हें गिरफ्तार किया गया। जेल में भी वे अपने हास्य और जोश के लिए मशहूर थे। एक बार जेल में साथी कैदियों को हंसाने के लिए उन्होंने कहा, ‘हम जेल में नहीं, लोकतंत्र की ट्रेनिंग कैंप में हैं।’ जॉली नेचर के थे राजनारायण : राजनारायण का जवाहरलाल नेहरू से भी कई बार वैचारिक टकराव हुआ। एक बार संसद में बहस के दौरान राजनारायण ने नेहरू की नीतियों पर तीखा हमला किया। मजाक में कहा, ‘पंडित जी, आप तो देश को लंदन की सैर कराने चले हैं!’ उनकी यह हास्यपूर्ण शैली संसद में चर्चा का विषय बनती थी। वे गंभीर मुद्दों को भी हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करने में माहिर थे। राजनारायण की बेबाकी का एक मजेदार किस्सा उनके सिगरेट पीने से जुड़ा है। एक बार संसद में बहस के दौरान वे सिगरेट पी रहे थे, जो नियमों के खिलाफ था। जब स्पीकर ने टोका, तो राजनारायण ने हंसते हुए कहा, साहब, ये सिगरेट नहीं, मेरे विचारों का धुआं है, जो बाहर निकल रहा है! यह सुनकर पूरी संसद ठहाकों से गूंज उठी। चुनावी रैलियों में अनोखा अंदाज : राजनारायण की चुनावी रैलियां उनके हास्य और देसी अंदाज के लिए मशहूर थीं। एक बार रायबरेली में रैली के दौरान उन्होंने इंदिरा गांधी पर तंज कसते हुए कहा, ‘वो दिल्ली में बैठकर राज करती हैं। मैं आपके खेतों में पसीना बहाता हूं। अब आप बताओ, आपका भाई कौन?’ उनकी यह देसी शैली जनता को खूब भाती थी। आखिरी दिनों की सादगी
राजनारायण का निधन 31 दिसंबर, 1986 को दिल्ली में हुआ। अपने अंतिम दिनों में भी वे सादगी से रहते थे। एक बार दिल्ली के एक बड़े नेता उनके घर पहुंचे, जहां उनके पास फर्नीचर के नाम पर बस कुछ कुर्सियां और एक पुरानी चारपाई थी। साथ में गए एक पत्रकार ने पूछा, आप इतने बड़े नेता होकर भी इतने सादे क्यों हैं? राजनारायण ने जवाब दिया, जो जनता के लिए लड़ा, उसे जनता जैसा ही रहना चाहिए। ———————- ये खबर भी पढ़ें… ‘जहां कृष्ण खेले, वो कुंज गलियां खत्म होंगी’, वृंदावन में बांके बिहारी के लिए बनी थीं; श्रद्धालु बोले- सहूलियत नहीं चाहिए इस वक्त बांके बिहारी मंदिर कॉरिडोर का सर्वे आखिरी चरण में है। सर्वे के बाद कुंज गलियों को तोड़ा जाएगा। इसके चलते कुंज गलियां चर्चा में हैं। इन्हें बचाने के लिए वृंदावन का गोस्वामी परिवार और स्थानीय दुकानदार विरोध कर रहे हैं। पढ़ें पूरी खबर