आग का गोला क्यों बन जाती हैं स्लीपर बसें:पश्चिम के देशों में बैन; भारत में लगातार हादसे, फिर भी प्रतिबंध क्यों नहीं

23 सितंबर की रात 9:30 बजे एक लग्जरी स्लीपर बस दिल्ली के कश्मीरी गेट से महोबा (यूपी) के लिए निकली। रात 11:30 बजे यमुना एक्सप्रेस-वे पर इसमें आग लग गई। 9 यात्री जल गए। शव इतनी बुरी तरह जल चुके थे कि पहचानना नामुमकिन था। इसी तरह के पुराने हादसों को देखें, तो पता चलता है कि छोटे से शॉर्ट सर्किट या किसी वाहन से मामूली टक्कर के बाद ये बसें आग का गोला बन जाती हैं। इंग्लैंड, जर्मनी, चीन समेत कई देशों में ये बसें बैन हैं, लेकिन भारत में नहीं। सवाल यह है कि लगातार हादसों के बाद भी स्लीपर बसें भारत में प्रतिबंधित क्यों नहीं हैं? छोटे से हादसे के बाद ही ये बसें आग का गोला कैसे बन जाती हैं? आज इन्हीं सवालों का जवाब पढ़िए यूपी एक्सप्लेनर में… सवाल-1: शॉर्ट सर्किट से ही स्लीपर बसें आग का गोला क्यों बन जाती हैं? ज्यादा मौतें क्यों होती हैं?
जवाब: इसकी 3 बड़ी वजह हैं… 1. इंटीरियर की वजह से आग तेजी से फैलती है 2. रात में सफर, थका ड्राइवर स्थिति संभाल नहीं पाता 3. स्लीपर बसों का गलत मॉडिफिकेशन सवाल-2: क्या स्लीपर बसों में हादसे का कोई खास पैटर्न भी दिखता है? जवाब: हां, पिछले 5 साल में स्लीपर बसों के 10 बड़े हादसों में 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। इनमें से 9 हादसे रात में हुए। उसमें भी ज्यादातर रात 12 से सुबह 6 बजे के बीच हुए। ज्यादातर मामलों में मौत का आंकड़ा इसलिए बढ़ा, क्योंकि लोग समय पर बाहर नहीं निकल सके। सवाल-3: कई देशों में स्लीपर बसों पर प्रतिबंध क्यों है? जवाब: यूरोप, अमेरिका, जर्मनी, चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई देशों में स्लीपर बसों पर पूरी तरह प्रतिबंध है। वहां की सरकारें यात्रियों को बस में लेटकर या सोकर सफर करने की इजाजत नहीं देतीं। इसके पीछे इन बसों की डिजाइन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा कानून और हादसों का साइंटिफिक एनालिसिस है। इसे ऐसे समझ सकते हैं… 1. अनिवार्य सीट बेल्ट कानून 2. बस पलटने का खतरा 3. इमरजेंसी एग्जिट में रुकावट 4. साइंटिफिक क्रैश टेस्ट और डेटा सवाल-4: तो फिर भारत में स्लीपर बसें बैन क्यों नहीं हैं? जवाब: इसके पीछे कई वजहें हैं। कम शब्दों में कहें, तो भारत का परिवहन ढांचा पश्चिमी देशों से काफी अलग है। इसे ऐसे समझ सकते हैं… 1. ट्रेनों पर भारी दबाव – त्योहारों में ट्रेनों में हफ्तों पहले टिकट बुक हो जाते हैं। ऐसे में स्लीपर बसें एकमात्र विकल्प बचती हैं। बसें यात्रियों को उनके शहर/गांव/कस्बे तक पहुंचा देती हैं, जो ट्रेन से संभव नहीं है। 2. रोजगार की जरूरत – भारत में प्राइवेट बस ऑपरेटर्स का बड़ा नेटवर्क है। स्लीपर बसों को अचानक बैन करने से पूरा ट्रांसपोर्ट सेक्टर संकट में आ सकता है। 3. लोगों की बदलती लाइफस्टाइल – मिडिल क्लास और कामकाजी लोग वीकेंड या छुट्टियों पर समय बचाने के लिए रात में सफर करना पसंद करते हैं। यात्री रात को बस में सोता है और सुबह सीधे अपने काम या घर पहुंच जाता है। इससे उसका होटल का खर्च और कीमती दिन बच जाता है। सवाल-5: तो क्या देश में स्लीपर बसों के लिए कोई नियम-कानून नहीं है? जवाब: ऐसा नहीं है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने स्लीपर बसों के लिए बेहद कड़े नियम और गाइडलाइंस लागू की हैं। आग की घटनाओं से बचने के लिए AIS-052 (बस बॉडी कोड) और AIS-119 (स्लीपर कोच मानक) के तहत नए नियम लागू हैं। ———————————– ये एक्सप्लेनर भी पढ़ें… क्या वाकई DJ की वजह से गई बच्ची की जान, साउंड वेव दिल की धड़कन कैसे रोक सकती है बलरामपुर में क्लास में बैठी एक बच्ची बेंच पर अचानक बेहोश हो गई। अस्पताल में उसे मृत घोषित कर दिया गया। स्कूलवालों ने बताया कि बच्ची जब बेहोश हुई, तब गणेश विसर्जन का जुलूस निकल रहा था। उसका डीजे इतना तेज था कि खिड़कियों के शीशे तक हिल रहे थे। आशंका जताई गई कि तेज आवाज से ही बच्ची को हार्ट अटैक आया और उसकी मौत हो गई। सवाल है कि तेज आवाज से ऐसा क्या असर होता है कि इंसान की मौत तक हो सकती है? आवाज का असर क्लास की सिर्फ एक ही बच्ची पर क्यों हुआ? पढ़िए, यूपी एक्सप्लेनर में…