क्या राजभर के लिए सपा के दरवाजे बंद:55 दिन में 49 बार अखिलेश पर हमले किए; जयंत, अनुप्रिया कैसे समझदार साबित हो रहे

सपा के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के जवाब में भाजपा ने ओमप्रकाश राजभर को NDA का प्रमुख चेहरा बनाया। लेकिन, इसके पीछे एक सोची-समझी सियासी रणनीति भी थी। राजभर ने पिछले 2 महीने में अखिलेश पर लगातार व्यक्तिगत हमले किए। कभी पूरी की पूरी सपा पार्टी टूटने का दावा कर दिया। कभी पूछा कि तुम सच में यदुवंशी हो क्या? अब सियासी गलियारों में चर्चा है कि अखिलेश से ओपी राजभर के संबंध पहले जितने मजबूत नहीं रहे। मायने साफ हैं कि चुनाव के वक्त भाजपा अगर उनकी मनमानी सीटें नहीं देती है, तो वह NDA से अलग अपनी राह नहीं बना सकेंगे। क्या भाजपा की यह स्ट्रैटजी सिर्फ ओपी राजभर तक सीमित रही? या अन्य सहयोगी दलों के नेता भी अब सीटों के मोलभाव की स्थिति में नहीं बचे हैं? आज की संडे बिग स्टोरी में जानते हैं… असल में क्षेत्रीय दल 2 तरह से मजबूत माने जाते हैं। पहला- उनका जनाधार कितना है? दूसरा- उनके पक्ष और विपक्ष की पार्टियों में पैठ कैसी है? भाजपा के साथ इस वक्त सुभासपा, रालोद, निषाद पार्टी और अपना दल (एस) गठबंधन में हैं। विधानसभा चुनाव से पहले सभी पार्टियां अपने सिंबल पर कैंडिडेट को चुनाव लड़वाना चाहती हैं। भाजपा की कोर कमेटी सभी 403 सीटों पर सिंबल और कैंडिडेट के लिए जिताऊ समीकरण पर फोकस कर रही है। ऐसे में सहयोगी दल सीटों पर अपने-अपने दावे रख रहे हैं। इसको पार्टियों के हिसाब से समझते हैं… 1. सुभासपा चुनाव के साथ पाला बदलते रहे हैं राजभर, इस बार मुश्किल होगा 2022 का विधानसभा चुनाव ओपी राजभर ने सपा के गठबंधन में लड़ा था। 16 सीटों पर कैंडिडेट उतारे, 6 पर जीत हासिल की थी। चूंकि यूपी में सरकार भाजपा की बनी, तो उन्होंने पाला बदला और सत्ता पक्ष की तरफ आ गए। अब 2027 के चुनाव से पहले राजभर 63 सीटों पर चुनाव लड़ने का दम दिखा रहे हैं। भाजपा इतनी सीटें देने को राजी नहीं होगी। राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल का कहना है- ओमप्रकाश राजभर का इतिहास गठबंधन को जल्दी झटका देने का रहा है। अगर उनके पास सपा का विकल्प खुला रहता, तो वह 2027 में टिकट बंटवारे के दौरान भाजपा को गठबंधन तोड़ने की धमकी दे सकते थे। लेकिन, अब उनके पास भाजपा की शर्तों पर चुनाव लड़ने के अलावा कोई मजबूत विकल्प नहीं बचा है। भाजपा ने अखिलेश पर व्यक्तिगत हमले करवाकर राजभर के सपा में जाने के रास्ते तकरीबन बंद करवा दिए हैं। 2. निषाद पार्टी उपचुनाव में सीटें छीनकर भाजपा ने पहले ही कम की ताकत यूपी में NDA के घटकों में सबसे कम राजनीतिक मोलभाव की स्थिति में संजय निषाद की पार्टी है। 2022 में निषाद पार्टी को 16 सीटें मिली थीं। 10 अपने सिंबल पर और 6 भाजपा के सिंबल पर लड़ी थीं। इनमें से 6 सीटों पर जीत मिली थी। कटेहरी और मझवां विधानसभा सीटों के विधायक लालजी वर्मा और डॉ. विनोद कुमार बिंद के सांसद बनने के बाद हालिया उपचुनावों में भाजपा ने ये दोनों सीटें निषाद पार्टी से छीन लीं। अपने प्रत्याशी उतारकर जीत दर्ज की। संतकबीरनगर सीट से संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद चुनाव हार चुके हैं। अब उनका मुख्य उद्देश्य अपने बेटों प्रवीण, सरवन और अमित को राजनीतिक में स्थापित करना है। सपा विरोधी बयानों के चलते उनके पास भी भाजपा के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है। 3. रालोद जयंत चौधरी खेल रहे ‘सेफ गेम’, विकल्प रखे खुले NDA के सहयोगी दलों में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) सबसे मजबूत स्थिति में है। पश्चिमी यूपी के जाट वोटबैंक पर पकड़ के कारण रालोद की स्थिति मजबूत है। 2024 में चौधरी चरण सिंह को ‘भारत रत्न’ मिलने के बाद जयंत NDA में आए और केंद्र में मंत्री बन गए। रालोद ने अपनी 9 मौजूदा सीटों के अलावा 20 से ज्यादा सीटों यानी कुल 30+ सीटों का दावा ठोका है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा उन्हें 20 के आसपास सीटें दे सकती है। जयंत लंबी राजनीति के तहत भविष्य के लिए विपक्षी रास्तों को बंद नहीं करना चाहते। इसलिए वह अखिलेश यादव या मायावती पर सीधे हमले करने से बचते हैं। 4. अपना दल (एस) कुर्मी वोटबैंक का मजबूत आधार, बयानों से बनाई दूरी अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) NDA की सबसे भरोसेमंद और मजबूत साथी है। वजह है, उसकी कुर्मी समाज पर पकड़। अनुप्रिया 2014 से लगातार भाजपा के साथ हैं। यूपी में 2017 में 9 और 2022 में 12 विधानसभा सीटें जीती थीं। अनुप्रिया पटेल और आशीष पटेल कभी भी सपा, कांग्रेस या बसपा के खिलाफ विवादित टिप्पणी नहीं करते। 2027 चुनाव में पार्टी 20 से ज्यादा सीटों की मांग करने की तैयारी कर रही है। मौजूदा 13 सीटों के साथ 6-7 अतिरिक्त सीटें मिलने की उम्मीद है। बयानों से दूरी बनाकर उन्होंने अपने राजनीतिक विकल्प हमेशा खुले रखे हैं। एक्सपर्ट मानते हैं- आखिरी वक्त पर सियासी समीकरण ही सब कुछ तय करेंगे एक्सपर्ट मानते हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात पर भाजपा ने आक्रामक बयानबाजी करवाकर सुभासपा और निषाद पार्टी की घेराबंदी कर दी है। यह सिक्के का सिर्फ एक पहलू भी हो सकता है। क्योंकि, ओपी राजभर के सियासी करियर का ट्रेंड इशारा करता है कि वह जिसकी बुराई करते हैं, वह बाद में उनकी सियासी मजबूरी भी बन जाते हैं। उदाहरण के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव में वह अखिलेश के साथ मंच साझा करते रहे। भाजपा के नेताओं पर अभद्र टिप्पणियां तक करते रहे। लेकिन, बाद में वह भाजपा के साथ गठबंधन करने में कामयाब रहे। इसलिए आखिरी वक्त पर सियासी समीकरण बदल भी सकते हैं। ———————————- यह एनालिसिस भी पढ़ें जंतर-मंतर प्रदर्शन में डिंपल क्यों दिखीं सख्त, अखिलेश ने इंग्लैंड से फोन पर कहा- वांगचुक से मिलो; यूपी की 6 करोड़ महिलाओं को साधा दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के दौरान मैनपुरी की सपा सांसद डिंपल यादव पहली बार किसी बड़े विरोध प्रदर्शन में प्रमुख चेहरा बनकर उभरीं। प्रदर्शन के दौरान उनका पुलिस से टकराव हुआ। लाठीचार्ज का मुखर होकर विरोध किया। घायल छात्रों से मुलाकात की और केंद्र सरकार पर तीखे सवाल उठाए। पढ़िए पूरी खबर…