प्रयागराज में तीन दिन से लगातार बारिश हो रही है। 72 घंटे में 205 मिमी. बारिश हुई है। इससे शहर के पॉश इलाकों में 3-5 फीट तक पानी भर गया है। सड़कें और गलियां तालाब में तब्दील हो गईं हैं। कई घरों में पानी घुस गया। लॉज और हॉस्टल में रहने वाले स्टूडेंट्स अपने घरों को जाने के लिए मजबूर हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि प्रशासन को स्कूल बंद करना पड़ा। नौकरी वाले ड्यूटी पर नहीं जा पा रहे, वकील कोर्ट नहीं पहुंचे। बारिश से बिगड़े हालात को लेकर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की और प्रशासन से जवाब तलब किया है। शहर की 3 तस्वीरें देखिए… इन इलाकों में 3-3.5 फीट तक भरा पानी जॉर्ज टाउन, टैगोर टाउन, अशोक नगर, एमजी मार्ग, जवाहरलाल नेहरू रोड, एलआईसी कॉलोनी, बाघंबरी स्कीम, अल्लापुर, विष्णुपुरी और अलका विहार कॉलोनी समेत कई इलाकों में जलभराव की समस्या सामने आई। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कुछ घंटों की तेज बारिश में प्रयागराज का ड्रेनेज सिस्टम क्यों चरमरा गया? दैनिक भास्कर की पड़ताल में इसकी 5 बड़ी वजहें सामने आई हैं। 1. जल निकासी की कमजोर प्लानिंग
2. पुराने ड्रेनेज सिस्टम की अनदेखी
3. बड़े नालों पर अवैध निर्माण
4. सड़क निर्माण में इंजीनियरिंग की खामियां
5. नाला सफाई की मॉनिटरिंग नहीं जानते हैं शहर में 10 ड्रेनेज और पंपिंग स्टेशन के बारे में बारिश के दौरान सभी ड्रेनेज स्टेशन काम कर रहे थे और कोई भी स्टेशन बंद नहीं था। इसके बावजूद शहर के कई प्रमुख इलाकों में लंबे समय तक जलभराव रहा। यही सवाल अब सबसे अहम है कि जब सभी ड्रेनेज स्टेशन चालू थे। शहर में करोड़ों रुपए से सीवर और जलनिकासी के काम हुए थे। नाला सफाई पर भी करीब 12 करोड़ रुपए खर्च किए गए, तो फिर बारिश का पानी समय पर बाहर क्यों नहीं निकल सका? 1. दो दिन में एक महीने के बराबर गिरा पानी प्रयागराज में भारी बारिश जलभराव की सबसे बड़ी वजह है। यहां जुलाई से सितंबर के बीच औसतन 1000 से 1100 मिमी बारिश होती है। इसी हिसाब से शहर का ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया गया है। लेकिन इस बार सिर्फ दो दिनों में करीब 205 मिमी बारिश हुई। रविवार से सोमवार दोपहर तक 90 मिमी और सोमवार दोपहर से मंगलवार दोपहर तक 115 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुई। यानी दो दिन में ही एक महीने के आसपास की बारिश हो गई। इस वजह से ऐसे हालात बने कि शहर में 5-5 फीट तक पानी भर गया। इस साल 1 जून से 18 अगस्त तक 522 मिमी बारिश दर्ज हो चुकी है। 2. महाकुंभ में 7 हजार करोड़ खर्च, फिर भी शहर पानी-पानी महाकुंभ के दौरान 7 हजार करोड़ रुपए के विकास कार्य हुए। 100 से ज्यादा सड़कों का चौड़ीकरण, मरम्मतीकरण और सौंदर्यीकरण कराया गया। 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की सीवर लाइनें भी बिछाई गईं। पूर्व आईएएस और प्रयागराज के पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी के मुताबिक, सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के दौरान कई जगह पुराने खुले नाले बंद कर दिए गए। सड़क किनारे पानी की निकासी के लिए छोटी जालियां और कनेक्टर बनाए गए। लेकिन इनकी क्षमता सतही पानी की निकासी के लिए पर्याप्त नहीं है। तेज बारिश में सड़क पर पानी तेजी से जमा हुआ। जालियां और कनेक्टर पानी को नालों तक नहीं पहुंचा सके। यानी विकास कार्यों में शहर को सुंदर बनाने पर जोर रहा, लेकिन जलनिकासी की जरूरत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। 3. पुराने बड़े नालों पर कब्जे से ड्रेनेज नेटवर्क ध्वस्त प्रयागराज के शहरी इलाकों में नजूल की सरकारी जमीन पर 100 से ज्यादा बड़े नाले थे। इन्हीं से बारिश का पानी शहर से बाहर निकलता था। पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी के मुताबिक, अंग्रेजों के समय सिविल लाइंस, जॉर्जटाउन, एलगिन रोड समेत कई इलाकों में बड़े नाले बनाए गए थे। इनका पानी अलग-अलग रास्तों से कंपनी गार्डन पहुंचता था। कंपनी गार्डन में एक रिजर्वायर बनाया गया था। इसमें बारिश का पानी जमा होता था। इसी पानी से वहां लगे पौधों की सिंचाई भी होती थी। यह व्यवस्था लंबे समय तक चलती रही। नालों की जमीन नजूल की सरकारी जमीन थी। पट्टा देते समय शर्त थी कि जलनिकासी के इन रास्तों से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। लेकिन बाद में जमीनें फ्री-होल्ड हुईं। कई जगह पुराने नालों को पाटकर निर्माण और प्लॉटिंग कर दी गई। बादल चटर्जी के मुताबिक, 2003 में नगर आयुक्त रहते हुए उन्होंने ऐसी जमीनों पर हुए निर्माण पर लाल निशान लगवाए थे। कार्रवाई के लिए लिखा-पढ़ी भी की गई, लेकिन बाद में मामला अटक गया। नगर निगम और जिला प्रशासन की ओर से इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। नतीजा यह हुआ कि भारी बारिश का पानी निकालने वाले कई बड़े नाले संकरे हो गए। कई नालों का अस्तित्व ही खत्म हो गया। इससे शहर की जलनिकासी व्यवस्था कमजोर होती चली गई। 4. सड़कें ऊंची हुईं, घर नीचे रह गए शहर के कई पुराने मोहल्लों में सड़कें लगातार ऊंची होती गईं। आसपास के मकान सड़क के मुकाबले नीचे रह गए। जॉर्जटाउन और टैगोर टाउन जैसे पॉश इलाकों में यह समस्या साफ दिखाई देती है। अफसरों का दावा है कि सड़क बनाने से पहले लेवल सर्वे कराया जाता है। लेकिन पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी का कहना है कि लेवल सर्वे सही तरीके से हुआ होता, तो ऐसी स्थिति नहीं बनती। जानकारों के मुताबिक, सड़क निर्माण में सिर्फ ऊंचाई और मजबूती देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि बारिश का पानी किस दिशा में जाएगा और नाले तक कितनी जल्दी पहुंचेगा। कई जगह सड़क से नाले तक पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट है। तेज बारिश में सड़कें पानी का कटोरा बन जाती हैं। पानी आसपास के घरों में घुस जाता है। 5. नालों की सफाई का काम एक ही एजेंसी को वरिष्ठ पार्षद कमलेश तिवारी ने नगर निगम की नाला सफाई व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पहले अलग-अलग नालों की सफाई के लिए अलग टेंडर होते थे। काम पार्षदों की निगरानी में कराया जाता था। इस बार शहर के सभी नालों की सफाई का काम एक ही एजेंसी को दिया गया। एजेंसी ने आगे पेटी कांट्रैक्टरों से काम कराया। प्रभावी मॉनिटरिंग नहीं होने से सफाई के नाम पर खानापूर्ति हुई। नाला सफाई पर करीब 12 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का दावा है। लेकिन दो दिनों की बारिश के बाद शहर में हुए जलभराव ने सफाई व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि यदि नालों की सफाई वास्तव में प्रभावी ढंग से हुई थी, तो इतनी बड़ी मात्रा में पानी जमा क्यों हुआ? पूर्व पार्षद मुकुंद तिवारी के मुताबिक, शहर में लगातार निर्माण हो रहे हैं, लेकिन इसके अनुरूप ड्रेनेज सिस्टम को अपग्रेड नहीं किया गया। महाकुंभ और उसके बाद माघ मेले से पहले जल्दबाजी में कई जगह सीवर लाइनें बिछाई गईं। कुछ लाइनों में पर्याप्त क्षमता वाले पाइप नहीं लगाए गए। ऐसे में बारिश के दौरान सीवर और ड्रेनेज सिस्टम पर दबाव बढ़ते ही व्यवस्था जवाब दे गई। बारिश को लेकर हाईकोर्ट ने क्यों लिया स्वत: संज्ञान? दो दिनों की बारिश के बाद प्रयागराज के कई मोहल्लों में हालात बदतर हो गए। शहर के उन इलाकों में भी जलभराव हुआ, जहां बड़ी संख्या में अधिवक्ता रहते हैं। मंगलवार को बार की ओर से ‘नो एडवर्स’ का निवेदन किया गया। इसी बीच शहर में जलभराव और आम लोगों की परेशानी को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों को तलब किया। अब सुनवाई में यह सवाल भी अहम होगा कि शहर की जलनिकासी व्यवस्था की जिम्मेदारी किन विभागों की है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शहर में पानी जमा होने के ये जिम्मेदार हैं… बारिश के दौरान जलभराव के लिए नगर आयुक्त सीलम साई तेजा, महापौर गणेश केशरवानी और डीके सचान चीफ इंजीनियर नगर निगम को जिम्मेदार बताया गया है। ————————— ये खबर भी पढ़िए- प्रयागराज में बारिश में गृहस्थी बर्बाद; लोग बोले- 3 दिन से चूल्हा नहीं जला, लाई-चना खा रहे प्रयागराज में रविवार रात 1 बजे से शुरू हुई बारिश तीसरे दिन भी जारी रही। तीन दिनों में कुल 209 मिमी बारिश दर्ज की गई। लगातार बारिश से हजारों घरों में पानी भर गया है। मुंडेरा की मीना जायसवाल ने बताया कि घर में खाना बनाने की जगह नहीं बची है। लाई-चना मंगाकर खाना पड़ रहा है। पढ़ें पूरी खबर…
2. पुराने ड्रेनेज सिस्टम की अनदेखी
3. बड़े नालों पर अवैध निर्माण
4. सड़क निर्माण में इंजीनियरिंग की खामियां
5. नाला सफाई की मॉनिटरिंग नहीं जानते हैं शहर में 10 ड्रेनेज और पंपिंग स्टेशन के बारे में बारिश के दौरान सभी ड्रेनेज स्टेशन काम कर रहे थे और कोई भी स्टेशन बंद नहीं था। इसके बावजूद शहर के कई प्रमुख इलाकों में लंबे समय तक जलभराव रहा। यही सवाल अब सबसे अहम है कि जब सभी ड्रेनेज स्टेशन चालू थे। शहर में करोड़ों रुपए से सीवर और जलनिकासी के काम हुए थे। नाला सफाई पर भी करीब 12 करोड़ रुपए खर्च किए गए, तो फिर बारिश का पानी समय पर बाहर क्यों नहीं निकल सका? 1. दो दिन में एक महीने के बराबर गिरा पानी प्रयागराज में भारी बारिश जलभराव की सबसे बड़ी वजह है। यहां जुलाई से सितंबर के बीच औसतन 1000 से 1100 मिमी बारिश होती है। इसी हिसाब से शहर का ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया गया है। लेकिन इस बार सिर्फ दो दिनों में करीब 205 मिमी बारिश हुई। रविवार से सोमवार दोपहर तक 90 मिमी और सोमवार दोपहर से मंगलवार दोपहर तक 115 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुई। यानी दो दिन में ही एक महीने के आसपास की बारिश हो गई। इस वजह से ऐसे हालात बने कि शहर में 5-5 फीट तक पानी भर गया। इस साल 1 जून से 18 अगस्त तक 522 मिमी बारिश दर्ज हो चुकी है। 2. महाकुंभ में 7 हजार करोड़ खर्च, फिर भी शहर पानी-पानी महाकुंभ के दौरान 7 हजार करोड़ रुपए के विकास कार्य हुए। 100 से ज्यादा सड़कों का चौड़ीकरण, मरम्मतीकरण और सौंदर्यीकरण कराया गया। 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की सीवर लाइनें भी बिछाई गईं। पूर्व आईएएस और प्रयागराज के पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी के मुताबिक, सड़क चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण के दौरान कई जगह पुराने खुले नाले बंद कर दिए गए। सड़क किनारे पानी की निकासी के लिए छोटी जालियां और कनेक्टर बनाए गए। लेकिन इनकी क्षमता सतही पानी की निकासी के लिए पर्याप्त नहीं है। तेज बारिश में सड़क पर पानी तेजी से जमा हुआ। जालियां और कनेक्टर पानी को नालों तक नहीं पहुंचा सके। यानी विकास कार्यों में शहर को सुंदर बनाने पर जोर रहा, लेकिन जलनिकासी की जरूरत पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। 3. पुराने बड़े नालों पर कब्जे से ड्रेनेज नेटवर्क ध्वस्त प्रयागराज के शहरी इलाकों में नजूल की सरकारी जमीन पर 100 से ज्यादा बड़े नाले थे। इन्हीं से बारिश का पानी शहर से बाहर निकलता था। पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी के मुताबिक, अंग्रेजों के समय सिविल लाइंस, जॉर्जटाउन, एलगिन रोड समेत कई इलाकों में बड़े नाले बनाए गए थे। इनका पानी अलग-अलग रास्तों से कंपनी गार्डन पहुंचता था। कंपनी गार्डन में एक रिजर्वायर बनाया गया था। इसमें बारिश का पानी जमा होता था। इसी पानी से वहां लगे पौधों की सिंचाई भी होती थी। यह व्यवस्था लंबे समय तक चलती रही। नालों की जमीन नजूल की सरकारी जमीन थी। पट्टा देते समय शर्त थी कि जलनिकासी के इन रास्तों से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। लेकिन बाद में जमीनें फ्री-होल्ड हुईं। कई जगह पुराने नालों को पाटकर निर्माण और प्लॉटिंग कर दी गई। बादल चटर्जी के मुताबिक, 2003 में नगर आयुक्त रहते हुए उन्होंने ऐसी जमीनों पर हुए निर्माण पर लाल निशान लगवाए थे। कार्रवाई के लिए लिखा-पढ़ी भी की गई, लेकिन बाद में मामला अटक गया। नगर निगम और जिला प्रशासन की ओर से इस पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। नतीजा यह हुआ कि भारी बारिश का पानी निकालने वाले कई बड़े नाले संकरे हो गए। कई नालों का अस्तित्व ही खत्म हो गया। इससे शहर की जलनिकासी व्यवस्था कमजोर होती चली गई। 4. सड़कें ऊंची हुईं, घर नीचे रह गए शहर के कई पुराने मोहल्लों में सड़कें लगातार ऊंची होती गईं। आसपास के मकान सड़क के मुकाबले नीचे रह गए। जॉर्जटाउन और टैगोर टाउन जैसे पॉश इलाकों में यह समस्या साफ दिखाई देती है। अफसरों का दावा है कि सड़क बनाने से पहले लेवल सर्वे कराया जाता है। लेकिन पूर्व मंडलायुक्त बादल चटर्जी का कहना है कि लेवल सर्वे सही तरीके से हुआ होता, तो ऐसी स्थिति नहीं बनती। जानकारों के मुताबिक, सड़क निर्माण में सिर्फ ऊंचाई और मजबूती देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि बारिश का पानी किस दिशा में जाएगा और नाले तक कितनी जल्दी पहुंचेगा। कई जगह सड़क से नाले तक पानी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट है। तेज बारिश में सड़कें पानी का कटोरा बन जाती हैं। पानी आसपास के घरों में घुस जाता है। 5. नालों की सफाई का काम एक ही एजेंसी को वरिष्ठ पार्षद कमलेश तिवारी ने नगर निगम की नाला सफाई व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पहले अलग-अलग नालों की सफाई के लिए अलग टेंडर होते थे। काम पार्षदों की निगरानी में कराया जाता था। इस बार शहर के सभी नालों की सफाई का काम एक ही एजेंसी को दिया गया। एजेंसी ने आगे पेटी कांट्रैक्टरों से काम कराया। प्रभावी मॉनिटरिंग नहीं होने से सफाई के नाम पर खानापूर्ति हुई। नाला सफाई पर करीब 12 करोड़ रुपए खर्च किए जाने का दावा है। लेकिन दो दिनों की बारिश के बाद शहर में हुए जलभराव ने सफाई व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल यह है कि यदि नालों की सफाई वास्तव में प्रभावी ढंग से हुई थी, तो इतनी बड़ी मात्रा में पानी जमा क्यों हुआ? पूर्व पार्षद मुकुंद तिवारी के मुताबिक, शहर में लगातार निर्माण हो रहे हैं, लेकिन इसके अनुरूप ड्रेनेज सिस्टम को अपग्रेड नहीं किया गया। महाकुंभ और उसके बाद माघ मेले से पहले जल्दबाजी में कई जगह सीवर लाइनें बिछाई गईं। कुछ लाइनों में पर्याप्त क्षमता वाले पाइप नहीं लगाए गए। ऐसे में बारिश के दौरान सीवर और ड्रेनेज सिस्टम पर दबाव बढ़ते ही व्यवस्था जवाब दे गई। बारिश को लेकर हाईकोर्ट ने क्यों लिया स्वत: संज्ञान? दो दिनों की बारिश के बाद प्रयागराज के कई मोहल्लों में हालात बदतर हो गए। शहर के उन इलाकों में भी जलभराव हुआ, जहां बड़ी संख्या में अधिवक्ता रहते हैं। मंगलवार को बार की ओर से ‘नो एडवर्स’ का निवेदन किया गया। इसी बीच शहर में जलभराव और आम लोगों की परेशानी को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया और संबंधित अधिकारियों को तलब किया। अब सुनवाई में यह सवाल भी अहम होगा कि शहर की जलनिकासी व्यवस्था की जिम्मेदारी किन विभागों की है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है। शहर में पानी जमा होने के ये जिम्मेदार हैं… बारिश के दौरान जलभराव के लिए नगर आयुक्त सीलम साई तेजा, महापौर गणेश केशरवानी और डीके सचान चीफ इंजीनियर नगर निगम को जिम्मेदार बताया गया है। ————————— ये खबर भी पढ़िए- प्रयागराज में बारिश में गृहस्थी बर्बाद; लोग बोले- 3 दिन से चूल्हा नहीं जला, लाई-चना खा रहे प्रयागराज में रविवार रात 1 बजे से शुरू हुई बारिश तीसरे दिन भी जारी रही। तीन दिनों में कुल 209 मिमी बारिश दर्ज की गई। लगातार बारिश से हजारों घरों में पानी भर गया है। मुंडेरा की मीना जायसवाल ने बताया कि घर में खाना बनाने की जगह नहीं बची है। लाई-चना मंगाकर खाना पड़ रहा है। पढ़ें पूरी खबर…