यूपी में शासन से लेकर जिला स्तर तक विभागों ने ठोस कचरा प्रबंधन से लेकर सड़कों के निर्माण तक में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं और नियम-कायदों के अनदेखी की है। बजट पास होने के बाद भी उसे जारी करने में देरी से सरकार को करोड़ों रुपए की चपत लगी। आम जनता को स्वच्छ भारत मिशन का पूरा फायदा नहीं मिला। किसानों को सरयू नहर परियोजना से सिंचाई का पूरा फायदा नहीं हुआ। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2021-22 तक की रिपोर्ट में योगी सरकार 1.0 के कार्यकाल के कई बड़े खुलासे हुए हैं। ठोस कचरा प्रबंधन में बजट बढ़ा, काम नहीं
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने 12 अगस्त को विधानसभा में सीएजी रिपोर्ट पेश की। इसमें सामने आया कि ठोस कचरा प्रबंधन के लिए न सरकार ने बजट जारी किया, न ही नगरीय निकायों ने दिलचस्पी दिखाई। निकायों में सफाई कर्मचारी से लेकर सफाई निरीक्षक तक के 50 फीसदी तक पद खाली हैं। निकायों ने नियम-कायदों को दरकिनार कर फर्मों को करोड़ों का फायदा पहुंचाया। प्रदेश में अप्रैल- 2016 से मार्च- 2022 तक 45 नगरीय निकायों में शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (कचरे का निपटान) पर CAG की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में सामने आया कि 45 में से मात्र 3 नगरीय निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन योजना तैयार की गई थी। 12 नगरीय निकायों में इससे संबंधित उप-विधि बनाई गई। शहरी स्थानीय निकायों में बनाई गई उप-विधि में एकरूपता का अभाव था। निकायों ने ठोस अपशिष्ट उत्पादन से संबंधित एक जैसे आंकड़े जारी किए थे। इससे आंकड़ों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध थी। प्रदेश सरकार ने न तो कचरा बीनने वालों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, न ही उनके पंजीकरण के लिए कोई योजना शुरू की। 35 स्थानीय निकायों में सफाई कर्मचारियों की कमी को आउटसोर्सिंग से पूरा किया जा रहा था। प्रशासनिक प्रबंधन में कमी वित्तीय प्रबंधन में कमी प्रबंधन में पाई गईं खामियां लखनऊ नगर निगम में हुई धांधली
CAG रिपोर्ट में लखनऊ नगर निगम में ठोस कचरा प्रबंधन और घर घर कचरा इकट्ठा करने में धांधली सामने आई है। पूर्व महापौर संयुक्ता भाटिया के कार्यकाल में मेसर्स इकोग्रीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को करोड़ों रुपए का फायदा पहुंचाने का खुलासा हुआ है। जनवरी- 2018 से मार्च- 2022 तक फर्म ने 215.89 करोड़ के बिल पेश किए। लेकिन, पर्यावरण अभियंता ने सत्यापन के बाद फर्म को 169.21 करोड़ का भुगतान किया। CAG ने पाया कि बिलों में अपशिष्ट की मात्रा मनमाने तरीके से अंकित की गई थी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शिवरी लखनऊ में अपशिष्ट प्रसंस्करण संयंत्र बंद पाया था। बोर्ड ने सितंबर- 2019 और अक्टूबर- 2020 में कुल 409 दिनों तक संयंत्र बंद रहने के कारण फर्म पर कुल 39.74 करोड़ की पेनल्टी लगाई। लेकिन, फर्म ने इस अवधि में ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण के बिल पेश किए। निगम ने फर्म को 5.28 करोड़ का भुगतान भी कर दिया। CAG ने इस राशि के भुगतान के लिए दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की संस्तुति की है। राज्य सरकार को सुझाव बिना अनुबंध के फर्म को राशि जारी की
CAG रिपोर्ट में सामने आया कि प्रयागराज कुंभ- 2019 में 10,000 मैट्रिक टन पुराने कचरे के निस्तारण का आदेश मई- 2019 में दिया गया। राज्य मिशन निदेशक ने बिना अनुबंध किए मेसर्स हरी भरी रिसाइकिलिंग प्राइवेट लिमिटेड को 95.28 लाख रुपए जारी कर दिया। इसमें फर्म को खाद की पैकेजिंग के लिए 15 लाख का लोन भी दिया गया। इस लोन की वापसी फर्म को खाद की बिक्री के बाद करनी थी। लेकिन, फर्म से राशि वसूल नहीं की गई। राशि बढ़ी तो सही, लेकिन मिली नहीं : CAG रिपोर्ट में सामने आया कि 2016-17 में ठोस कचरा प्रबंधन का कुल बजट 74.49 करोड़ था। जो 2021-22 में बढ़कर 1650.67 करोड़ तक पहुंच गया। लेकिन, सरकार ने राशि जारी नहीं की। PWD ने सड़कों की सुरक्षा से किया खिलवाड़
लोक निर्माण विभाग (PWD) ने केंद्रीय सड़क निधि (सीआरएफ) के तहत सड़क बनाने में सड़कों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया। वहीं, इंडियन रोड कांग्रेस के मानकों के दरकिनार कर मनमर्जी से वास्तविक जरूरत से 3 गुना अधिक राशि का बजट प्रावधान किया। CAG ने 2016-17 से लेकर 2012-22 तक सीआरएफ के उपयोग पर रिपोर्ट पेश कर हर स्तर पर खामियां पाई हैं। इनमें से अधिकांश अवधि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के कार्यकाल की है। CAG ने माना कि पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने राज्य की सड़कों को सुरक्षित और सड़क सुरक्षा मानदंडों के अनुरूप बनाने के लए सड़क सुरक्षा लेखा परीक्षा की जरूरत को उचित महत्व नहीं दिया। किसी भी खंडीय कार्यालय में महत्वपूर्ण रिकार्ड, कार्य पंजिका, ठेकेदार खाता बही का रखरखाव नहीं किया गया। CAG रिपोर्ट में सामने आया कि देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाला यूपी सड़कों की लंबाई की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। राज्य में कुल 4,42,907 किलोमीटर सड़कों का नेटवर्क है। इसमें से 2,98,242 किलोमीटर सड़कें जनवरी- 2023 तक पीडब्ल्यूडी के अधीन थीं। प्रदेश सरकार की ओर से 2016-17 से लेकर 2022-23 तक सड़कों के विकास पर केंद्रीय सड़क निधि से 7257.86 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 78 फीसदी काम निर्धारित अवधि से 59 से लेकर 1474 दिनों तक देरी से पूरे हुए। नियोजन और वित्तीय प्रबंधन में मिली खामियां
पीडब्लूडी ने 2021-22 तक केंद्रीय सड़क निधि के तहत सड़कों के विकास के लिए कोई योजना नहीं होने के कारण सीआरएफ के अधीन प्रस्तावों को सामान्य रूप से स्वीकृत कराया। सड़कों के लिए यातायात का सर्वे नहीं किया गया। इसके चलते सड़कों के विकास के लिए उनकी पहचान और प्राथमिकता का निर्धारण सही ढंग से नहीं किया जा सका। बजट प्रावधान और वास्तविक आवश्यकता के बीच बड़ा अंतर पाया गया। 2016-17 से 2022-23 के दौरान 6492.09 करोड़ की लागत से बनने वाली सड़कों के लिए सीआरएस में 20,730 करोड़ रुपए (319 फीसदी अधिक) का प्रावधान किया गया। 2021-22 में 23 खंडों में 77 कार्यों की जांच में सामने आया कि ठेकेदारों को 846.39 करोड़ का भुगतान किया गया। लेकिन लेखा पुस्तकों में 1226.64 करोड़ का भुगतान अंकित था। अधिकारियों ने अन्य कार्यों से संबंधित 333.70 करोड़ का व्यय भी इन कार्यों में जोड़ दिया। अनुमान पर ही किया काम : पीडब्ल्यूडी ने यातायात की गणना इंडियन रोड कांग्रेस के मानकों के अनुसार नहीं की। वास्तविक यातायात वृद्धि दर और वाहन डैमेज फैक्टर की गणना एक्सल लोड सर्वे के अनुसार करने की जगह सांकेतिक मानकों के आधार पर की। भारी वित्तीय गड़बड़ी भी मिलीं
CAG ने खुलासा किया कि वित्तीय नियमों और निविदा मानदंडों के विपरीत कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति और प्राविधिक स्वीकृति से पहले टेंडर आमंत्रित किए गए। अल्पकालीन निविदा सूचना देते हुए टेंडर किए गए। टेंडर खोलने के बाद सड़क निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी और अनिवार्य मदों को हटाकर 111 में से 15 निविदाओं की बिल पुनरीक्षित कर 50 फीसदी से अधिक किया गया। उन्हें बाद में अतिरिक्त मदों में दिखाया गया। बीओक्यू में बदलाव के बाद नए सिरे से एनआईटी आमंत्रित किए बिना कार्य आवंटन किया गया। इससे वंचित ठेकेदारों को बीओक्यू के अनुसार बिड में शामिल होने का मौका नहीं मिला। मनमर्जी से किया भुगतान
CAG रिपोर्ट में सामने आया कि खंडीय अधिकारियों ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन कर 8 कार्यों में माप अंकित करने से पहले ठेकेदारों को 45.68 करोड़ का भुगतान किया था। 2016-17 से लेकर 2021-22 के दौरान ठेकेदारों को भुगतान की गई राशि और लेखा पुस्तकों में दर्ज राशि में काफी बड़ा अंतर देखने को आया। सप्लायर्स को दिए गए एडवांस और सरकारी खातों के बाहर धन जमा मिला। खंडीय अधिकारियों यह सुनिश्चित नहीं किया कि ठेकेदारों को 74 अनुबंधों में भुगतान किए गए एडवांस और 66 अनुबंधों में उपकरण की अग्रिम राशि का उपयोग वास्तव में अभीष्ट प्रयोजन के लिए था। टेंडर की शर्त के विपरीत 8 कार्यों में सुरक्षित अग्रिम और 9 कार्य की बिल ऑफ क्वांटिटी में शामिल नहीं की गई मदों का भुगतान किया गया। 40 साल बाद बनी सरयू परियोजना भी अधूरी
40 साल के इंतजार के बाद 2021 में पूरी हुई सरयू नहर परियोजना का फायदा भी 20 फीसदी हिस्से को ही मिल सका है। नहरों से खेतों तक पानी लाने के लिए राप्ती मुख्य नहर एवं इनकी वितरण प्रणाली का उपयोग नहीं किया जा सका। सरयू नहर परियोजना का गठन 1982 में 299.20 करोड़ की लागत से शुरू हुआ था। प्रदेश के पूर्वी भाग में घाघरा नदी के उस पार के क्षेत्र में 3.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित करने के लिए योजना बनाई गई थी। परियोजना से पूर्वी यूपी के 9 जिलों में 11.29 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्र का विकास करना था। इससे 14.04 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षमता सृजित की जानी थी। 2021 में परियोजना का लोकार्पण किया गया। इस पर कुल 10,003.11 करोड़ रुपए खर्च किए गए। CAG रिपोर्ट में सामने आया कि आवश्यक भूमि के अधिग्रहण और खरीद करने में विलंब और बजट देर से जारी करने के कारण परियोजना पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इससे न केवल परियोजना में विलंब हुआ, बल्कि लागत में भी वृद्धि हुई। CAG ने माना कि परियोजना का प्रबंधन कमजोर था। टेंडर बिना तकनीकी निविदा स्वीकृत कराए आमंत्रित की गईं। ठेकेदारों को टेंडर फार्म जमा करने का पर्याप्त समय नहीं दिया गया। अधिक व्यय और ठेकेदारों को अनुचित फायदा पहुंचाने के मामले भी CAG के सामने आए। मिट्टी के कार्य और पक्के काम की गुणवत्ता जांच निर्धारित मानकों के अनुसार नहीं करने से काम की गुणवत्ता कमजोर रही। सरकार को करोड़ रुपए का हुआ नुकसान
सरकारी विभागों की हीलाहवाली और गड़बड़ियों के कारण 2017-18 से लेकर 2021-22 तक सरकार के करोड़ों रुपए बेकार हो गए। CAG की मार्च- 2022 को समाप्त हुए वर्ष की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… मकबरे पर भगवा लहराने पर विधानसभा में हंगामा, माता प्रसाद बोले- भाजपा दंगा कराना चाहती है, हम झुकेंगे नहीं; जोरदार नारेबाजी यूपी विधानसभा में दूसरे दिन फतेहपुर के मकबरे में भगवा झंडा लगाने और तोड़फोड़ का मामला छाया रहा। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि संगठित ढंग से एक पार्टी के नेता ने ऐलान किया। कहा, ये मकबरा हिंदुओं का है। पुलिस ने बैरिकेडिंग की, लेकिन भीड़ घुस गई। सौहार्द बिगाड़ने का काम चल रहा है। मदरसों और मकबरों को तोड़ो, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़े। पढ़ें पूरी खबर
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने 12 अगस्त को विधानसभा में सीएजी रिपोर्ट पेश की। इसमें सामने आया कि ठोस कचरा प्रबंधन के लिए न सरकार ने बजट जारी किया, न ही नगरीय निकायों ने दिलचस्पी दिखाई। निकायों में सफाई कर्मचारी से लेकर सफाई निरीक्षक तक के 50 फीसदी तक पद खाली हैं। निकायों ने नियम-कायदों को दरकिनार कर फर्मों को करोड़ों का फायदा पहुंचाया। प्रदेश में अप्रैल- 2016 से मार्च- 2022 तक 45 नगरीय निकायों में शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (कचरे का निपटान) पर CAG की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में सामने आया कि 45 में से मात्र 3 नगरीय निकायों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन योजना तैयार की गई थी। 12 नगरीय निकायों में इससे संबंधित उप-विधि बनाई गई। शहरी स्थानीय निकायों में बनाई गई उप-विधि में एकरूपता का अभाव था। निकायों ने ठोस अपशिष्ट उत्पादन से संबंधित एक जैसे आंकड़े जारी किए थे। इससे आंकड़ों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध थी। प्रदेश सरकार ने न तो कचरा बीनने वालों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, न ही उनके पंजीकरण के लिए कोई योजना शुरू की। 35 स्थानीय निकायों में सफाई कर्मचारियों की कमी को आउटसोर्सिंग से पूरा किया जा रहा था। प्रशासनिक प्रबंधन में कमी वित्तीय प्रबंधन में कमी प्रबंधन में पाई गईं खामियां लखनऊ नगर निगम में हुई धांधली
CAG रिपोर्ट में लखनऊ नगर निगम में ठोस कचरा प्रबंधन और घर घर कचरा इकट्ठा करने में धांधली सामने आई है। पूर्व महापौर संयुक्ता भाटिया के कार्यकाल में मेसर्स इकोग्रीन एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड को करोड़ों रुपए का फायदा पहुंचाने का खुलासा हुआ है। जनवरी- 2018 से मार्च- 2022 तक फर्म ने 215.89 करोड़ के बिल पेश किए। लेकिन, पर्यावरण अभियंता ने सत्यापन के बाद फर्म को 169.21 करोड़ का भुगतान किया। CAG ने पाया कि बिलों में अपशिष्ट की मात्रा मनमाने तरीके से अंकित की गई थी। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने शिवरी लखनऊ में अपशिष्ट प्रसंस्करण संयंत्र बंद पाया था। बोर्ड ने सितंबर- 2019 और अक्टूबर- 2020 में कुल 409 दिनों तक संयंत्र बंद रहने के कारण फर्म पर कुल 39.74 करोड़ की पेनल्टी लगाई। लेकिन, फर्म ने इस अवधि में ठोस अपशिष्ट प्रसंस्करण के बिल पेश किए। निगम ने फर्म को 5.28 करोड़ का भुगतान भी कर दिया। CAG ने इस राशि के भुगतान के लिए दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की संस्तुति की है। राज्य सरकार को सुझाव बिना अनुबंध के फर्म को राशि जारी की
CAG रिपोर्ट में सामने आया कि प्रयागराज कुंभ- 2019 में 10,000 मैट्रिक टन पुराने कचरे के निस्तारण का आदेश मई- 2019 में दिया गया। राज्य मिशन निदेशक ने बिना अनुबंध किए मेसर्स हरी भरी रिसाइकिलिंग प्राइवेट लिमिटेड को 95.28 लाख रुपए जारी कर दिया। इसमें फर्म को खाद की पैकेजिंग के लिए 15 लाख का लोन भी दिया गया। इस लोन की वापसी फर्म को खाद की बिक्री के बाद करनी थी। लेकिन, फर्म से राशि वसूल नहीं की गई। राशि बढ़ी तो सही, लेकिन मिली नहीं : CAG रिपोर्ट में सामने आया कि 2016-17 में ठोस कचरा प्रबंधन का कुल बजट 74.49 करोड़ था। जो 2021-22 में बढ़कर 1650.67 करोड़ तक पहुंच गया। लेकिन, सरकार ने राशि जारी नहीं की। PWD ने सड़कों की सुरक्षा से किया खिलवाड़
लोक निर्माण विभाग (PWD) ने केंद्रीय सड़क निधि (सीआरएफ) के तहत सड़क बनाने में सड़कों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया। वहीं, इंडियन रोड कांग्रेस के मानकों के दरकिनार कर मनमर्जी से वास्तविक जरूरत से 3 गुना अधिक राशि का बजट प्रावधान किया। CAG ने 2016-17 से लेकर 2012-22 तक सीआरएफ के उपयोग पर रिपोर्ट पेश कर हर स्तर पर खामियां पाई हैं। इनमें से अधिकांश अवधि डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के कार्यकाल की है। CAG ने माना कि पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों ने राज्य की सड़कों को सुरक्षित और सड़क सुरक्षा मानदंडों के अनुरूप बनाने के लए सड़क सुरक्षा लेखा परीक्षा की जरूरत को उचित महत्व नहीं दिया। किसी भी खंडीय कार्यालय में महत्वपूर्ण रिकार्ड, कार्य पंजिका, ठेकेदार खाता बही का रखरखाव नहीं किया गया। CAG रिपोर्ट में सामने आया कि देश में सबसे अधिक जनसंख्या वाला यूपी सड़कों की लंबाई की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। राज्य में कुल 4,42,907 किलोमीटर सड़कों का नेटवर्क है। इसमें से 2,98,242 किलोमीटर सड़कें जनवरी- 2023 तक पीडब्ल्यूडी के अधीन थीं। प्रदेश सरकार की ओर से 2016-17 से लेकर 2022-23 तक सड़कों के विकास पर केंद्रीय सड़क निधि से 7257.86 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 78 फीसदी काम निर्धारित अवधि से 59 से लेकर 1474 दिनों तक देरी से पूरे हुए। नियोजन और वित्तीय प्रबंधन में मिली खामियां
पीडब्लूडी ने 2021-22 तक केंद्रीय सड़क निधि के तहत सड़कों के विकास के लिए कोई योजना नहीं होने के कारण सीआरएफ के अधीन प्रस्तावों को सामान्य रूप से स्वीकृत कराया। सड़कों के लिए यातायात का सर्वे नहीं किया गया। इसके चलते सड़कों के विकास के लिए उनकी पहचान और प्राथमिकता का निर्धारण सही ढंग से नहीं किया जा सका। बजट प्रावधान और वास्तविक आवश्यकता के बीच बड़ा अंतर पाया गया। 2016-17 से 2022-23 के दौरान 6492.09 करोड़ की लागत से बनने वाली सड़कों के लिए सीआरएस में 20,730 करोड़ रुपए (319 फीसदी अधिक) का प्रावधान किया गया। 2021-22 में 23 खंडों में 77 कार्यों की जांच में सामने आया कि ठेकेदारों को 846.39 करोड़ का भुगतान किया गया। लेकिन लेखा पुस्तकों में 1226.64 करोड़ का भुगतान अंकित था। अधिकारियों ने अन्य कार्यों से संबंधित 333.70 करोड़ का व्यय भी इन कार्यों में जोड़ दिया। अनुमान पर ही किया काम : पीडब्ल्यूडी ने यातायात की गणना इंडियन रोड कांग्रेस के मानकों के अनुसार नहीं की। वास्तविक यातायात वृद्धि दर और वाहन डैमेज फैक्टर की गणना एक्सल लोड सर्वे के अनुसार करने की जगह सांकेतिक मानकों के आधार पर की। भारी वित्तीय गड़बड़ी भी मिलीं
CAG ने खुलासा किया कि वित्तीय नियमों और निविदा मानदंडों के विपरीत कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति और प्राविधिक स्वीकृति से पहले टेंडर आमंत्रित किए गए। अल्पकालीन निविदा सूचना देते हुए टेंडर किए गए। टेंडर खोलने के बाद सड़क निर्माण के लिए आवश्यक बुनियादी और अनिवार्य मदों को हटाकर 111 में से 15 निविदाओं की बिल पुनरीक्षित कर 50 फीसदी से अधिक किया गया। उन्हें बाद में अतिरिक्त मदों में दिखाया गया। बीओक्यू में बदलाव के बाद नए सिरे से एनआईटी आमंत्रित किए बिना कार्य आवंटन किया गया। इससे वंचित ठेकेदारों को बीओक्यू के अनुसार बिड में शामिल होने का मौका नहीं मिला। मनमर्जी से किया भुगतान
CAG रिपोर्ट में सामने आया कि खंडीय अधिकारियों ने अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन कर 8 कार्यों में माप अंकित करने से पहले ठेकेदारों को 45.68 करोड़ का भुगतान किया था। 2016-17 से लेकर 2021-22 के दौरान ठेकेदारों को भुगतान की गई राशि और लेखा पुस्तकों में दर्ज राशि में काफी बड़ा अंतर देखने को आया। सप्लायर्स को दिए गए एडवांस और सरकारी खातों के बाहर धन जमा मिला। खंडीय अधिकारियों यह सुनिश्चित नहीं किया कि ठेकेदारों को 74 अनुबंधों में भुगतान किए गए एडवांस और 66 अनुबंधों में उपकरण की अग्रिम राशि का उपयोग वास्तव में अभीष्ट प्रयोजन के लिए था। टेंडर की शर्त के विपरीत 8 कार्यों में सुरक्षित अग्रिम और 9 कार्य की बिल ऑफ क्वांटिटी में शामिल नहीं की गई मदों का भुगतान किया गया। 40 साल बाद बनी सरयू परियोजना भी अधूरी
40 साल के इंतजार के बाद 2021 में पूरी हुई सरयू नहर परियोजना का फायदा भी 20 फीसदी हिस्से को ही मिल सका है। नहरों से खेतों तक पानी लाने के लिए राप्ती मुख्य नहर एवं इनकी वितरण प्रणाली का उपयोग नहीं किया जा सका। सरयू नहर परियोजना का गठन 1982 में 299.20 करोड़ की लागत से शुरू हुआ था। प्रदेश के पूर्वी भाग में घाघरा नदी के उस पार के क्षेत्र में 3.54 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित करने के लिए योजना बनाई गई थी। परियोजना से पूर्वी यूपी के 9 जिलों में 11.29 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य क्षेत्र का विकास करना था। इससे 14.04 लाख हेक्टेयर सिंचित क्षमता सृजित की जानी थी। 2021 में परियोजना का लोकार्पण किया गया। इस पर कुल 10,003.11 करोड़ रुपए खर्च किए गए। CAG रिपोर्ट में सामने आया कि आवश्यक भूमि के अधिग्रहण और खरीद करने में विलंब और बजट देर से जारी करने के कारण परियोजना पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इससे न केवल परियोजना में विलंब हुआ, बल्कि लागत में भी वृद्धि हुई। CAG ने माना कि परियोजना का प्रबंधन कमजोर था। टेंडर बिना तकनीकी निविदा स्वीकृत कराए आमंत्रित की गईं। ठेकेदारों को टेंडर फार्म जमा करने का पर्याप्त समय नहीं दिया गया। अधिक व्यय और ठेकेदारों को अनुचित फायदा पहुंचाने के मामले भी CAG के सामने आए। मिट्टी के कार्य और पक्के काम की गुणवत्ता जांच निर्धारित मानकों के अनुसार नहीं करने से काम की गुणवत्ता कमजोर रही। सरकार को करोड़ रुपए का हुआ नुकसान
सरकारी विभागों की हीलाहवाली और गड़बड़ियों के कारण 2017-18 से लेकर 2021-22 तक सरकार के करोड़ों रुपए बेकार हो गए। CAG की मार्च- 2022 को समाप्त हुए वर्ष की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। ————————— ये खबर भी पढ़ें… मकबरे पर भगवा लहराने पर विधानसभा में हंगामा, माता प्रसाद बोले- भाजपा दंगा कराना चाहती है, हम झुकेंगे नहीं; जोरदार नारेबाजी यूपी विधानसभा में दूसरे दिन फतेहपुर के मकबरे में भगवा झंडा लगाने और तोड़फोड़ का मामला छाया रहा। नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने कहा कि संगठित ढंग से एक पार्टी के नेता ने ऐलान किया। कहा, ये मकबरा हिंदुओं का है। पुलिस ने बैरिकेडिंग की, लेकिन भीड़ घुस गई। सौहार्द बिगाड़ने का काम चल रहा है। मदरसों और मकबरों को तोड़ो, जिससे सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़े। पढ़ें पूरी खबर