जंतर-मंतर प्रदर्शन में डिंपल ने क्यों दिखीं सख्त:अखिलेश ने इंग्लैंड से फोन पर कहा- वांगचुक से मिलो; यूपी की 6 करोड़ महिलाओं को साधा

दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के विरोध में हुए छात्र आंदोलन के दौरान मैनपुरी की सपा सांसद डिंपल यादव पहली बार किसी बड़े विरोध प्रदर्शन में प्रमुख चेहरा बनकर उभरीं। प्रदर्शन के दौरान उनका पुलिस से टकराव हुआ। लाठीचार्ज का मुखर होकर विरोध किया। घायल छात्रों से मुलाकात की और केंद्र सरकार पर तीखे सवाल उठाए। प्रदर्शन में कंधे से कंधा मिलाकर कई महिला सांसद भी डिंपल यादव के साथ चलीं। राजनीतिक गलियारों में इसे सपा की यूपी में 6.90 करोड़ महिला मतदाताओं तक अपनी पहुंच मजबूत करने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। डिंपल का अचानक आक्रामक तरीके से एक्टिव होना, सपा के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा? पढ़िए रिपोर्ट… डिंपल प्रदर्शन का चेहरा होंगी, इसकी शुरुआत अखिलेश के फोन से हुई हुआ यूं कि जंतर-मंतर पर चल रहा प्रदर्शन तेज हो रहा था। भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ रही थी। अखिलेश यादव इंग्लैंड गए हुए थे। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, अखिलेश को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने पहले सोनम वांगचुक से फोन पर बात की। तारीख थी- 14 जुलाई…। अगले ही दिन उन्होंने डिंपल यादव को कॉल करके पार्टी के सांसदों के साथ जंतर-मंतर जाने के लिए कहा। डिंपल वहां पहुंची, तो जंतर-मंतर पर मौजूद युवाओं, खासकर महिलाओं के बीच चर्चा का विषय बनीं। फिर 20 जुलाई काे हुए प्रदर्शन के दौरान डिंपल की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छा गईं। उन्होंने सपा सांसदों के साथ संसद से जंतर-मंतर तक मार्च का नेतृत्व किया। पुलिस से आमने-सामने हुईं, घायल छात्रों को पानी पिलाया, इलाज का इंतजाम किया और केंद्र सरकार व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर तीखा हमला बोलते हुए इस्तीफे की मांग की। तस्वीरों में वह घायल छात्रों की मदद करती और उनका हालचाल लेती नजर आईं। एक वीडियो में घायल को घर तक पहुंचवाने का इंतजाम करती दिखाई दे रही हैं तो दूसरे वीडियो में बेहोश पड़े प्रदर्शनकारी को होश में लाने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं। डिंपल और अन्य सांसदों को जब हिरासत में लिया गया तो वह पुलिस से सख्त तेवर में सवाल करती दिखाई देती हैं। वो बैरिकेडिंग हटाने के लिए अड़ जाती हैं। एक ही दिन में मौके की नजाकत के हिसाब से उसी किरदार में खुद को ढालती नजर आईं थीं। डिंपल को पहली बार बड़े प्रदर्शन को लीड करने का मौका मिला इसे अब यूपी की पॉलिटिक्स से भी जोड़कर देखा जा रहा है। अखिलेश के फैसले से डिंपल को पहली बार बड़े विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने का मौका मिला। डिंपल का वह रूप लोगों को देखने को मिला, जो सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आया था। प्रदर्शन करने वाले लोगों के बीच डिंपल को जो सपोर्ट मिला, उससे उनका हौसला काफी बढ़ गया। वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह कहते हैं- यूपी की राजनीति एक ठहराव पर आ गई थी। किसका कौन-सा वोट बैंक है, ये सबको पता है। सपा भी एक तय राजनीतिक पैटर्न पर आगे बढ़ रही थी। ऐसे में डिंपल यादव के चेहरे के जरिए सपा महिला मतदाताओं के बीच पैठ बनाने में कामयाब हो सकती है। इससे नए वोटर जोड़ने में उनकी पार्टी को मदद मिलेगी। ऐसा नहीं है कि डिंपल पहली बार सार्वजनिक रूप से इस रूप में नजर आई हों। कोविड काल में भी उनकी संवेदनशीलता लोगों ने देखी थी। इस बार उन्हें जो प्लेटफॉर्म मिला उसने उन्हें खुद को साबित करने का मौका दिया। अब आने वाले चुनाव के नतीजे बताएंगे कि डिंपल का आक्रामक होना सपा के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा। डिंपल सख्ती से सवाल पूछती रहीं- क्या यही रामराज्य है… डिंपल जब मीडिया के सामने आईं तो वहां भी उन्होंने अपने लहजे को सरकार के लिए कठोर रखा। लोकतंत्र और इतिहास का काला दिन बताया। आरोप लगाया कि पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज किया। बेटियों के कपड़े फाड़े। करंट दिया और छाती-सिर पर डंडे मारे। जबकि नियम पैरों पर बल प्रयोग का है। वह सवाल पूछती हैं- क्या यही भाजपा का रामराज्य है? जहां अधिकार मांगने वाले छात्रों को पीटा जाए और बेटियों के कपड़े फाड़े जाएं? यह मां भारत का सीना है, जिस पर प्रहार हुआ। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे, जवाबदेही और वोट से जवाब देने की बात भी कही। एक मंच पर PDA की पूरी तस्वीर दिखाने की कोशिश खास बात ये रही कि 20 जुलाई को जब प्रदर्शन हो रहा था, उस दिन अखिलेश यादव भी दिल्ली में मौजूद थे। लेकिन छात्रों से संवाद और भाजपा पर हमले का नेतृत्व डिंपल के हाथ में सौंप रखा था। एक अहम फैक्ट ये भी रहा कि यहां भी सपा का PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक मंच से लेकर सड़क तक साथ दिखा। इकरा हसन सपा के अल्पसंख्यक चेहरे के रूप में लोकप्रिय हैं। जंतर-मंतर पर उनकी मौजूदगी ने अल्पसंख्यक वर्ग की मजबूत भागीदारी दर्ज कराई। प्रिया सरोज दलित समुदाय (अनुसूचित जाति) से आती हैं और देश की सबसे युवा सांसदों में से एक हैं। डिंपल यादव खुद पिछड़ा वर्ग (OBC) बहुल मैनपुरी का प्रतिनिधित्व करती हैं। धर्मेंद्र यादव, पुष्पेंद्र सरोज जैसे सांसद भी डिंपल के साथ-साथ थे। सपा 2024 से लगातार PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को अपने मुख्य राजनीतिक नैरेटिव के तौर पर पेश कर रही है। जंतर-मंतर पर भी उसी सामाजिक समीकरण को मंच पर उतारने की कोशिश दिखी। सपा की रणनीति- पार्टी का महिला चेहरा बनें डिंपल राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं- डिंपल में यह बदलाव छात्रों की स्थिति देखने के बाद स्वाभाविक गुस्से का नतीजा है। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी उपचुनाव जीतकर डिंपल ने अपनी पहचान बनाई। पार्टी उन्हें महिला चेहरा और संगठनात्मक भूमिका में मजबूत करना चाहती है, ताकि भाजपा के महिला सुरक्षा और गुंडागर्दी वाले नैरेटिव का जवाब दिया जा सके। डिंपल का ये तेवर सपा की नई रणनीति का हिस्सा है। इकरा बोलीं- डिंपल का ऐसा रूप पहली बार देखा डिंपल यादव की पहचान एक मृदुभाषी महिला के रूप में है। संसद में अखिलेश के पीछे बैठती हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में बदलाव आया। 2023 में मणिपुर हिंसा पर तल्ख भाषण, 2024 में किसानों-शिक्षा-स्वास्थ्य पर आक्रामक बयान, एनकाउंटर मुद्दों पर सवाल और हाल के संसद के सत्रों में मुखरता दिखी हैं। कैराना से सांसद इकरा हसन कहती हैं कि वह डिंपल यादव के साथ सदन में रही हैं और कई अलग-अलग मौकों पर भी उनसे मुलाकात होती रहती है, लेकिन उनका ये आक्रामक रवैया पहले नहीं दिखा था। तो क्या यूपी चुनाव में डिंपल फ्रंट में दिखेंगी? संसद के अंदर अखिलेश यादव भाजपा पर आक्रामक दिखे। जबकि डिंपल और सपा सांसद बाहर छात्रों के लिए मोर्चा संभाले हुए थे। इस ट्रैंड को एक्सपर्ट यूपी के आने वाले चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। वह कहते हैं कि यूपी के चुनावों में अमूमन अखिलेश यादव डिंपल को जनसभाओं में भेजने से बचते हैं। लेकिन अब जो हालात हैं, उनमें ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले चुनाव में डिंपल अपनी पार्टी के कैंडिडेट्स के लिए फील्ड में प्रचार करती हुई दिखें। इसकी एक वजह ये भी है कि आधी आबादी को पार्टी से जोड़ने के लिए डिंपल को आगे किया जा रहा है।
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