उत्तराखंड में फर्जी फ्रीडम फाइटर सर्टिफिकेट से MBBS एडमिशन के 4 मामले सामने आने के बाद जांच आगे बढ़ी तो एक ऐसे नेटवर्क का पता चला, जिसका काम ही फर्जी डॉक्यूमेंट तैयार कर मेडिकल एडमिशन दिलाना था। उन्होंने उत्तराखंड की एक मेडिकल सीट का रेट 45 लाख रुपए फिक्स कर रखा था। पहली किस्त मिलने के बाद ये काम शुरू करते थे और बच्चे के नंबर कितने भी आए हों, उसे उस MBBS सीट की काउंसलिंग में बैठने लायक बना देते थे। नेटवर्क सिर्फ उत्तराखंड में नहीं, बल्कि बिहार, बंगाल, गुजरात जैसे दूसरे राज्यों में भी एडमिशन दिलाता था। लेकिन आखिर ये बच्चों तक कैसे पहुंचते थे और कैसे पूरा नेटवर्क काम करता था, ये जानने के लिए हमारी ये रिपोर्ट पढ़िए…
मेरठ की कंसल्टेंसी से चलता था पूरा नेटवर्क उत्तराखंड पुलिस इस गैंग से जुड़े तीन लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है, मामला एसआईटी संभाल रही है। SIT से ही हुई पूछताछ में मास्टरमाइंड रुपेश पंडित ने अपने काम करने के तरीके का खुद खुलासा किया है। उसने बताया कि वह मेरठ में करीब 5 साल से MECODO नाम की एजुकेशन कंसल्टेंसी चला रहा था। कंसल्टेंसी के जरिए पहले अलग-अलग कोर्स में एडमिशन का काम होता था। इसके बाद नेटवर्क ने अलग-अलग कोटे के जरिए MBBS सीट दिलाने का रास्ता पकड़ लिया। शुरुआत में NRI कोटे से MBBS सीट दिलाने का काम किया जाता था। बाद में दूसरे कोटे के जरिए एडमिशन कराने का काम भी शुरू हो गया। बहुगुणा की शिकायत से खुला मामला, 5 पर FIR इस पूरे मामले की पहली कड़ी प्रदीप बहुगुणा की शिकायत से जुड़ती है। 3 सितंबर को उन्होंने जिलाधिकारी और चिकित्सा शिक्षा विभाग को पत्र देकर कुछ कैंडिडेट्स के फ्रीडम फाइटर डिपेंडेंट और डोमिसाइल सर्टिफिकेट की जांच की मांग की। उन्होंने खुद दस्तावेज और पतों की पड़ताल की थी। शिकायत के बाद प्रशासन ने जांच कराई, जिसमें फ्रीडम फाइटर डिपेंडेंट कोटे के 5 सर्टिफिकेट फर्जी पाए गए। इसके बाद मामले में 5 लोगों के खिलाफ FIR हुई। SIT का गठन करने के बाद जांच हुई और फौरन चार मामलों में फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर मिले MBBS एडमिशन भी रद्द किए गए। यहीं से मामला सिर्फ फर्जी सर्टिफिकेट तक सीमित नहीं रहा। जांच आगे बढ़ी तो फर्जी डॉक्यूमेंट तैयार कराने वाले इस पूरे नेटवर्क तक पहुंच गई। फर्जी प्रमाणपत्र से लेकर सरकारी वेरिफिकेशन तक सवाल अब जांच का सबसे अहम हिस्सा यह है कि फर्जी प्रमाणपत्र तैयार होने के बाद वे सरकारी प्रक्रिया तक कैसे पहुंचे। SIT फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले CSC सेंटरों की भूमिका भी खंगाल रही है। डिजिटल सिग्नेचर, सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया की जांच की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि संबंधित विभाग में किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका थी या नहीं और आरोपियों को सरकारी रिकॉर्ड या डिजिटल सिस्टम तक पहुंच कैसे मिली। इस मामले में डीएम देहरादून ने दो पटवारियों को भी निलंबित किया है। भास्कर कर चुका ऐसी ही गैंग का पर्दाफाश करीब एक महीने दैनिक भास्कर की टीम ने बिहार में एक ऐसे ही मेडिकल एडमिशन गैंग का पर्दाफाश किया था। रिपोर्टर ने खुद कैंडिडेट बनकर गैंग से संपर्क किया और फर्जी MBBS सीट की डील की पूरी प्रक्रिया को कैमरे पर रिकॉर्ड किया था। उस गैंग में भी कम नंबर वाले कैंडिडेट के सामने मेडिकल सीट दिलाने के बदले 18 लाख रुपए की डील रखी जाती थी। ————————–
बिहार से देशभर में MBBS सीट की बिक्री:एजेंट बोले- 18 लाख में सरकारी कॉलेज, रैंक कुछ भी हो बंगाल-राजस्थान के कॉलेजों में सीट बुक “बंगाल के 11 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अपनी सेटिंग है। रैंक कितनी भी हो, 18 लाख खर्च कीजिए, आपको सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट दिला दूंगा। जिस रैंक में लोग सरकारी मेडिकल कॉलेज का सपना नहीं देख पाते, उस रैंक में आपका एडमिशन हो जाएगा। हम कॉलेज को 4-5 करोड़ देकर पहले से सीट बुक रखते हैं। (पढ़ें पूरी खबर)
मेरठ की कंसल्टेंसी से चलता था पूरा नेटवर्क उत्तराखंड पुलिस इस गैंग से जुड़े तीन लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है, मामला एसआईटी संभाल रही है। SIT से ही हुई पूछताछ में मास्टरमाइंड रुपेश पंडित ने अपने काम करने के तरीके का खुद खुलासा किया है। उसने बताया कि वह मेरठ में करीब 5 साल से MECODO नाम की एजुकेशन कंसल्टेंसी चला रहा था। कंसल्टेंसी के जरिए पहले अलग-अलग कोर्स में एडमिशन का काम होता था। इसके बाद नेटवर्क ने अलग-अलग कोटे के जरिए MBBS सीट दिलाने का रास्ता पकड़ लिया। शुरुआत में NRI कोटे से MBBS सीट दिलाने का काम किया जाता था। बाद में दूसरे कोटे के जरिए एडमिशन कराने का काम भी शुरू हो गया। बहुगुणा की शिकायत से खुला मामला, 5 पर FIR इस पूरे मामले की पहली कड़ी प्रदीप बहुगुणा की शिकायत से जुड़ती है। 3 सितंबर को उन्होंने जिलाधिकारी और चिकित्सा शिक्षा विभाग को पत्र देकर कुछ कैंडिडेट्स के फ्रीडम फाइटर डिपेंडेंट और डोमिसाइल सर्टिफिकेट की जांच की मांग की। उन्होंने खुद दस्तावेज और पतों की पड़ताल की थी। शिकायत के बाद प्रशासन ने जांच कराई, जिसमें फ्रीडम फाइटर डिपेंडेंट कोटे के 5 सर्टिफिकेट फर्जी पाए गए। इसके बाद मामले में 5 लोगों के खिलाफ FIR हुई। SIT का गठन करने के बाद जांच हुई और फौरन चार मामलों में फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर मिले MBBS एडमिशन भी रद्द किए गए। यहीं से मामला सिर्फ फर्जी सर्टिफिकेट तक सीमित नहीं रहा। जांच आगे बढ़ी तो फर्जी डॉक्यूमेंट तैयार कराने वाले इस पूरे नेटवर्क तक पहुंच गई। फर्जी प्रमाणपत्र से लेकर सरकारी वेरिफिकेशन तक सवाल अब जांच का सबसे अहम हिस्सा यह है कि फर्जी प्रमाणपत्र तैयार होने के बाद वे सरकारी प्रक्रिया तक कैसे पहुंचे। SIT फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले CSC सेंटरों की भूमिका भी खंगाल रही है। डिजिटल सिग्नेचर, सरकारी रिकॉर्ड और प्रमाणपत्र जारी होने की प्रक्रिया की जांच की जा रही है। पुलिस यह भी पता लगा रही है कि संबंधित विभाग में किसी अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका थी या नहीं और आरोपियों को सरकारी रिकॉर्ड या डिजिटल सिस्टम तक पहुंच कैसे मिली। इस मामले में डीएम देहरादून ने दो पटवारियों को भी निलंबित किया है। भास्कर कर चुका ऐसी ही गैंग का पर्दाफाश करीब एक महीने दैनिक भास्कर की टीम ने बिहार में एक ऐसे ही मेडिकल एडमिशन गैंग का पर्दाफाश किया था। रिपोर्टर ने खुद कैंडिडेट बनकर गैंग से संपर्क किया और फर्जी MBBS सीट की डील की पूरी प्रक्रिया को कैमरे पर रिकॉर्ड किया था। उस गैंग में भी कम नंबर वाले कैंडिडेट के सामने मेडिकल सीट दिलाने के बदले 18 लाख रुपए की डील रखी जाती थी। ————————–
बिहार से देशभर में MBBS सीट की बिक्री:एजेंट बोले- 18 लाख में सरकारी कॉलेज, रैंक कुछ भी हो बंगाल-राजस्थान के कॉलेजों में सीट बुक “बंगाल के 11 सरकारी मेडिकल कॉलेजों में अपनी सेटिंग है। रैंक कितनी भी हो, 18 लाख खर्च कीजिए, आपको सरकारी मेडिकल कॉलेज में सीट दिला दूंगा। जिस रैंक में लोग सरकारी मेडिकल कॉलेज का सपना नहीं देख पाते, उस रैंक में आपका एडमिशन हो जाएगा। हम कॉलेज को 4-5 करोड़ देकर पहले से सीट बुक रखते हैं। (पढ़ें पूरी खबर)